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Palagan
संस्कारों में शॉर्टकट: सुविधा की दौड़ में कहीं हम अपनी जड़ें तो नहीं खो रहे?

संस्कारों में शॉर्टकट: सुविधा की दौड़ में कहीं हम अपनी जड़ें तो नहीं खो रहे?

समय के साथ परम्पराओं में परिवर्तन स्वाभाविक है। हर युग अपनी परिस्थितियों के अनुसार कुछ बदलाव करता है। परन्तु परिवर्तन और सुविधावाद (Convenience) में एक सूक्ष्म किन्तु महत्वपूर्ण अंतर है। आज चिंता इस बात की है कि कहीं हम सुविधा को ही धर्म और परम्परा का पर्याय तो नहीं बना रहे।

आजकल यह सुनने को अक्सर मिलता है—"मृत्युसंस्कार चार दिन में ही कर देते हैं, सबको समय कहाँ है।" कोई कहता है—"सुपात्र ब्राह्मण को दान देने के बजाय किसी अनाथालय में दान कर देंगे, वही पर्याप्त है।" विवाह में पंडितजी से आग्रह होता है—"मंत्र जल्दी पढ़ दीजिए, वीडियो शूट और रिसेप्शन का समय हो रहा है।"

प्रश्न यह नहीं है कि दान अनाथालय को दिया जाए या ब्राह्मण को। प्रश्न यह है कि क्या हम दया और दान का अंतर समझ रहे हैं? क्या हर धार्मिक विधान के पीछे निहित उद्देश्य को जाने बिना केवल अपनी सुविधा के अनुसार उसका विकल्प चुन लेना उचित है?

आज विवाह के संस्कारों में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। हल्दी, तेल, मांगर, बिनेगी जैसी पारिवारिक परम्पराएँ धीरे-धीरे केवल फोटो और वीडियो के दृश्य बनकर रह गई हैं। कई घरों में इन्हें "ऑप्शनल" मान लिया गया है। यदि यही क्रम चलता रहा तो क्या कल कोई यह भी नहीं पूछेगा कि सात फेरों की आवश्यकता ही क्या है? एक या दो फेरे ही पर्याप्त क्यों नहीं?

संस्कार केवल कर्मकाण्ड नहीं हैं। वे परिवार, समाज और पीढ़ियों को जोड़ने वाले सांस्कृतिक सूत्र हैं। उनका उद्देश्य केवल कोई धार्मिक प्रक्रिया पूरी करना नहीं, बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों को समाज और परिवार के साथ जोड़ना है।

दुर्भाग्य से इस स्थिति के लिए केवल नई पीढ़ी को दोष देना भी उचित नहीं होगा। समाज के वरिष्ठों की चुप्पी भी कम उत्तरदायी नहीं है। अक्सर वे सोचते हैं कि यदि बच्चों को परम्परा समझाई तो वे बुरा मान जाएंगे या उन्हें पुरातनपंथी समझेंगे। परिणाम यह होता है कि नई पीढ़ी को यह पता ही नहीं चलता कि किसी रीति का मूल स्वरूप क्या था और उसका उद्देश्य क्या था।

हम किसी परम्परा को मानें या न मानें, उसमें परिवर्तन करें या न करें—यह प्रत्येक परिवार का निर्णय हो सकता है। किन्तु निर्णय ज्ञान के आधार पर होना चाहिए, अज्ञान के आधार पर नहीं। पहले यह तो बताया जाए कि परम्परा क्या है, उसका कारण क्या है, उसका महत्व क्या है। उसके बाद नई पीढ़ी यदि परिस्थितियों के अनुसार कोई निर्णय लेती है, तो वह अधिक जिम्मेदार निर्णय होगा।

संस्कारों में सुधार का स्वागत होना चाहिए, परन्तु शॉर्टकट का नहीं। सुविधा यदि विवेक पर हावी हो जाए, तो धीरे-धीरे परम्पराएँ केवल मंचन बन जाती हैं—जिनमें भावना कम और प्रदर्शन अधिक रह जाता है।

समाज के वरिष्ठों से यही अपेक्षा है कि वे अपने अनुभव और ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँ। निर्णय का अधिकार बच्चों का है, लेकिन परम्परा का परिचय कराना बड़ों का कर्तव्य है। यदि यह कड़ी टूट गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल फिल्मों और सोशल मीडिया से ही अपने संस्कार सीखेंगी।

संस्कारों का संरक्षण केवल पंडितों या धर्माचार्यों का दायित्व नहीं है। यह प्रत्येक परिवार की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि हमने समय रहते इस विषय पर गंभीरता से विचार नहीं किया, तो कहीं ऐसा न हो कि आने वाले वर्षों में हमारे संस्कार केवल कैमरे के लिए निभाए जाने वाले दृश्य बनकर रह जाएँ और उनकी आत्मा हमसे हमेशा के लिए दूर हो जाए।

MUNINDRA NATH CHATURVEDI