जली को आग कहते हैं, बुझी को राख कहते हैं, जिस राख से फेफड़े कंडम हो, उसे फ्लेवर्ड हुक्के का धुँआ कहते हैं।

 

 

जो हुक्का मुगलों की शाही पहचान हुआ करता था, आज के युवा उसके दीवाने हो चुके हैं। इस हद तक कि हर मौका जैसे- शादी, बैचलर्स नाईट, यंगस्टर्स की आफ्टर पार्टी या दोस्तों के साथ जन्मदिन का जश्न, हुक्के के बिना उनको अधूरा सा लगता है। जिस हुक्के ने अवध के नवाबों को अपनी उंगलियों पर नचाया, उस हुक्के के आधुनिक अंदाज ने नवाबों के शहर का दरवाजा 10 वर्ष पूर्व फिर खटखटाया।

ऐसी क्या खासियत है इसमें कि हमारे युवा हुक्के के, अरे माफ करिएगा, " फ्लेवर्ड हुक्के"  के कायल बन चुके हैं इस हद तक कि जहां एक दशक पहले लखनऊ शहर में हुक्का बार के नाम पर बस जीरो डिग्री, औरा और ब्लू डी लाऊंज हुआ करते थे, अब यह संख्या 150 पार कर चुकी है? युवाओं को लगता है कि हुक्का पीना कूल है। वह इसे शोऑफ का माध्यम साझते हैं। स्मार्टनेस और कूलनेस की दौड़ में हमने इंटेलिजेंस को पीछे छोड़ दिया है।

फ्लेवर्ड हुक्का की दीवानगी का कारण जानते हैं युवाओं से...

•   राज श्रीवास्तव (21) 16 साल की उम्र से हुक्का पी रहे हैं। अब महीने में एक बार दोस्तों के साथ हुक्का पीने के लिए रायॅल स्काई चले जाते हैं। हुक्का पीकर व्हाईट रिंग्स बनाना उन्हे ज्यादा पसंद है। वह जानते हैं कि सेहत के लिए नुकसानदायक है, पर उनका कहना है कि बॉडी थोड़े से धुंए से अपना बचाव कर सकती है।

सनी सिंह (19) ने कहा कि वह टेस्ट की वजह से हुक्का पीते हैं। दो साल से पी रहे हें और जानते हैं कि सेहत के लिए नुकसानदायक है। आदित्य मलिक (22) ने दोस्तों के प्रेशर की वजह से 12वीं के बाद हुक्का शुरू किया। उनका दावा है कि फलेवर्ड हुक्का सेहत के लिए हानिकारक नहीं है।

डॉक्टरों की राय

फ्लेवर्ड हुक्का में कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), कारसीनोजनिक कम्पांउड, केमिकल और बहुत ज्यादा टेम्परेचर होता है। CO से बॉडी का ऑक्सीजन कम हो जाता है। कारसीनोजनिक कंपाउंड की वजह से अलग-अलग तरह के कैंसर होते हैं। केमिकल, मेटल, टार पूरे श्वसन तंत्र और होठ से लेकर फेफड़े, दिल (लकवा) और दिमाग पर असर करता है। इसके  ज्यादा टेम्परेचर के कारण श्वसन तंत्र में सूखापन आने लगता है। सिलविया जो शरीर के अंदर के बुरे कणों का ऊपर की ओर बढ़ाता है, वह काम करना बंद कर देता है।

इसके स्मोक से श्वसन तंत्र के गॉब्लेट ग्लैंड अति सक्रिय हो जाते हैं। इससे फेफड़े की बीमारियां जैसे साइनोसाइटिस, ब्रोंकाइटिस, ब्रोंकल आसथमा होने का खतरा है। ज्यादा हुक्का पीने वालों को क्रोनिक ब्रोंकाइटिस और क्रोनिक ऑबस्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीज (सी. ओ. पी.डी.) जैसी जानलेवा बीमारियां होने का खतरा है।

डॉक्टरों का मानना है कि हुक्के से स्मोकिंग की आदत पड़ती है। उनके पास दिन में 25-30 सांस के मरीज आते हैं और हैरानी की बात यह है कि हर 10 में से एक मरीज 15 से 18 साल की उम्र के युवा/युवती होते हैं। उनका कहना है कि लड़कों से ज्यादा लड़कियां इसकी चपेट में हैं। लड़कियों को इसकी वजह से अनियमित माहवारी और बांझपन जैसी परेशानियां हो सकती हैं।

विदुषी गौर (20) ने कहा कि उन्होंने छठवीं में पहली बार अपने पापा के साथ घर में हुक्का पीया था। वह कहती हैं कि बच्चे दोस्तों के दबाव में आकर हुक्का पीना शुरू करते हैं। यह आजकल स्टाइल स्टेटमेंट बन गया है।

 

कुछ महत्वपूर्ण सवाल :

  • फ्लेवर्ड हुक्का में तम्बाकु होता है या नहीं?

 इस सवाल का सही जवाब दे पाना कठिन है। एक तरफ डॉक्टरों का दावा है कि हुक्का बार वाले अपने कस्टमर्स को दोबारा बुलाने के लिए उसमें तम्बाकु या निकोटीन की मिलावट करते हैं। वहीं हुक्का बार में काम कर रहे लोगों का दावा है कि उनके लाऊंज में मिल रहे हुक्के में किसी तरह का तम्बाकु या निकोटीन नहीं है। उनका तो यह दावा भी कहना है कि वह 18 साल से कम उम्र के लागों को हुक्का सर्व ही नहीं करते।

  •  अगर तम्बाकु नहीं है फिर हुक्का क्यों छोड़े?

फ्लेवर्ड हुक्का (शीशा)  में CO की मात्रा सिगरेट के बराबर या उससे ज्यादा होती है। यह CO खून के अंदर के ऑक्सीजन का शरीर के ज़रूरी अंगों तक पहुंच पाना मुश्किल कर देता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन (WHO) के मुताबिक हुक्का का एक सेशन 20 से 80 मिनट के बीच होता है। हुक्का पीने वाला एक सेशन में 100 या ज्याद सिगरेट के बराबर स्मोक अंदर ले लेता है । शीशा का फलों सा टेस्ट उसमें मौजूद टॉक्सिन की वजह से होता है। जितना ज्यादा टेस्ट उतना ज्यादा टॉक्सिन।

  • हर्बल हुक्का हर्बल होता है, इससे सेहत को क्या नुकसान?

बैरी फिनेगन, एनेस्थिसियोलॉजी और पेन मेडिसलन के प्रोफेसर, फैकल्टी ऑफ मैडिसन ऑड डेनटिस्ट्री, यूनिवर्सिटी ऑफ आलबर्टा ने कहा है कि हुक्का के आगे ‘हर्बल’ शब्द लगाना, ‘हर्बल’ शब्द का दुरुपयोग है। हर्बल हुक्के में सिगरेट जितने ही कॉरसीनोजनिक कम्पाउंड जैसे नेफ्थलीन और कोल टार पाए जाते हैं जो सेहत के लिए नुकसानदायक हैं।

  • युवा जानते हैं कि हुक्का सेहत के लिए हानिकारक है, फिर भी इसको क्यों पीते हैं?

इसपर मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि युवा हर वह काम करते हैं जो उनको बड़े होने का और शान-ओ- शौकत का एहसास दिलाता है। इसकी शुरूआत पैसे वाले दोस्त करवाते हैं फिर धीरे धीरे युवाओं को इसकी आदत लग जाती है। उनका कहना है आदत बनने से पहले ही युवाओं को बड़ों से बात करके खुद को सुधारना चाहिए। आदत को भी प्रोफेशनल काउंसलिंग से बदला जा सकता है।

  • क्या हुक्के की लत छुड़ाना नामुमकिन है?

ऐसा बिल्कुल नहीं है। लखनऊ के 19 वर्षीय अविरल पांडेय ने बताया कि उनको कक्षा 9 में हुक्के की इतनी बुरी लत लगी थी कि वह बस घर से निकलते थे और दोस्तों के साथ हुक्का बार पहुंचते थे। हफ्ते में 2-3 बार तो हुक्का पीना जरूरी था। एक साल बाद उनके दोस्त ने उन्हें बताया कि यह कितना हानिकरक है। वो दिन है और आज का दिन है, वह दोस्तों के साथ हुक्का बार कई बार गए, पर हुक्के को हाथ तक नहीं लगाया।

बदलाव का रास्ता लम्बा है, उसको पार करने के लिए खुद में सुधार करो, रुकावटें तुमको रोक नहीं पाएंगी, खुद पर यह विश्वास करो ।

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

 डॉक्टर का संदेश

बच्चों को किसी कीमत पर फ्लेवर्ड हुक्का नहीं लेना चाहिए। माता-पिता को खयाल रखना चाहिए। वह बच्चे के आदर्श होते हैं। उनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए। बच्चों का पहला स्कूल घर होता है। माता-पिता को बच्चों से दोस्तों की तरह व्यवहार करना चाहिए।

डॉ. आशुतोष कुमार दूबे, मेडिकल सुपरिटेंडेंट, सिविल अस्पताल, लखनऊ

मनोविज्ञानी का संदेश

बच्चों के लिए यह बहुत हानिकारक है और उनको किसी सूरत पर यह नहीं पीना चाहिए। माता-पिता को भी हुक्के का सेवन नहीं करना चाहिए। बच्चे माता-पिता से ही सीखते हैं। माता-पिता को जागरूक होना चाहिए। यह इतना हानिकारक है कि इसे मार्केट में उपलब्ध ही नहीं होना चाहिए।

डॉ. कृष्णा द्विवेदी चिकित्सा मनोवैज्ञानिक (ऑनररी टीचिंग), केजीएमयू, लखनऊ

 

सुदीति चतुर्वेदी

22 वर्ष

 

Sudeeti Chaturvedi