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Palagan
आशुतोष चतुर्वेदी , सूचना आयुक्त  से बातचीत

आशुतोष चतुर्वेदी हिंदी पत्रकारिता के वरिष्ठ और अनुभवी स्तंभ हैं, जिनके पास चार दशकों से अधिक का अनुभव है। वे हिंदी साहित्य और पत्रकारिता की समृद्ध परंपरा से जुड़े हैं। उन्होंने माया पत्रिका से अपनी यात्रा शुरू की और इंडिया टुडे, संडे ऑब्जर्वर, जागरण, बीबीसी लंदन, अमर उजाला (कार्यकारी संपादक) तथा प्रभात खबर (प्रधान संपादक) जैसे प्रतिष्ठित माध्यमों में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं।
दिसंबर 2025 में भारत सरकार द्वारा उन्हें केंद्रीय सूचना आयोग में सूचना आयुक्त नियुक्त किया गया है। यह पद उनके लिए पत्रकारिता का एक नया, संवैधानिक विस्तार है—जहाँ अब वे सूचना के अधिकार के माध्यम से पारदर्शिता और लोकतंत्र को मजबूत करने का दायित्व निभा रहे हैं। उन्होंने अुपनी सभी परीक्षाएं दसवीं से लेकर एम.एस. सी, एम. फिल तक परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की हैं. आशुतोष चतुर्वेदी का जीवन सत्य, नैतिकता और जनसेवा का प्रतीक रहा है। Palagan.com पर उनके साथ यह साक्षात्कार उनकी यात्रा, विरासत और सूचना के अधिकार की शक्ति पर गहन बातचीत है।                                                                       


 नया दायित्व, नया अनुभव 


पालागन : पत्रकारिता के लंबे सफ़र के बाद सूचना आयुक्त की भूमिका में आना आपको अंदर से कैसा महसूस करा रहा है?


आशुतोष चतुर्वेदी : यह भूमिका मेरे लिए पत्रकारिता का ही एक विस्तारित रूप है। पत्रकार के रूप में मैं सवाल पूछता था और सच्चाई उजागर करने की कोशिश करता था। अब सूचना आयुक्त के रूप में मैं यह सुनिश्चित कर रहा हूँ कि आम नागरिक को भी वही अधिकार मिले—सवाल पूछने का, जानकारी पाने का। अंदर से एक गहरी संतुष्टि है कि अब मैं उस प्रक्रिया का हिस्सा हूँ जो पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करती है। यह नया दायित्व चुनौतीपूर्ण है, लेकिन मेरी पत्रकारिता की जड़ें इसे आसान बनाती हैं।


परिवार और संस्कार

आप हिंदी साहित्य और पत्रकारिता की एक समृद्ध परंपरा से आते हैं। पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी के परिवार के होने के नाते इस नए संवैधानिक दायित्व को आप कैसे देखते हैं?

पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी जी ने 'विशाल भारत' जैसी पत्रिका के माध्यम से हिंदी साहित्य और पत्रकारिता को नई ऊँचाई दी। उनका जीवन सत्य, नैतिकता और जनसेवा का प्रतीक था। इस विरासत के कारण मुझे यह दायित्व एक संवैधानिक पद से ज्यादा, एक पारिवारिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी लगता है। मैं इसे ऐसे देखता हूँ कि सूचना का अधिकार जनता को सशक्त बनाए, ठीक वैसे ही जैसे बनारसीदास जी ने साहित्य और पत्रकारिता से समाज को जागृत किया।


नाम से जुड़ी जिम्मेदारी
 “चतुर्वेदी” नाम अपने आप में एक बौद्धिक और नैतिक विरासत का बोध कराता है। क्या यह विरासत आपके निर्णयों और सोच पर कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी डालती है?

बिल्कुल डालती है। 'चतुर्वेदी' सिर्फ एक उपनाम नहीं, चार वेदों की विद्या और नैतिकता का प्रतीक है। यह मुझे याद दिलाता है कि हर फैसला निष्पक्ष, पारदर्शी और सत्य के पक्ष में होना चाहिए। जब कोई अपील मेरे पास आती है, तो मैं सोचता हूँ—क्या यह फैसला उस विरासत के योग्य है? यह अतिरिक्त जिम्मेदारी मुझे और सतर्क बनाती है, लेकिन साथ ही प्रेरित भी करती है।


घर से सीखी पहली सीख
अपने परिवार या बचपन से मिली कौन-सी सीख आपको आज भी सार्वजनिक जीवन में सबसे अधिक काम आती है?

बचपन में घर में सबसे बड़ी सीख थी—सत्य बोलो, चाहे कितना भी कड़वा हो। परिवार में अध्यापन और साहित्य का माहौल था, जहाँ कहा जाता था कि ज्ञान बाँटने से बढ़ता है। आज सूचना आयुक्त के रूप में यही सीख काम आती है—सूचना छिपाना नहीं, बाँटनी है। ईमानदारी और स्पष्टता से काम करने की यही आदत मुझे हर फैसले में मदद करती है।


पत्रकार आज भी भीतर है?

क्या आज भी कोई खबर, कोई सवाल या कोई आम नागरिक की पीड़ा आपको उसी तरह बेचैन करती है जैसे पत्रकारिता के दिनों में करती थी?

हाँ, बिल्कुल। पत्रकारिता मेरे खून में है। जब कोई आरटीआई अपील में कोई गरीब किसान, मजदूर या छात्र की पीड़ा सामने आती है—जैसे भ्रष्टाचार से प्रभावित योजना या अधिकारों का हनन—तो वही बेचैनी जागती है। मैं अब भी सोचता हूँ कि यह खबर कैसे उजागर हो सकती है, लेकिन अब मेरी भूमिका फैसला देना है ताकि सच्चाई सामने आए। वह पत्रकार आज भी जीवित है, बस अब सवाल सुनकर जवाब देता है।


पत्रकारिता मिस करते हैं?

क्या आपको कभी लगता है कि काश आज भी आप उसी भूमिका में होते जहाँ सवाल पूछना ही काम था?

कभी-कभी हाँ, क्योंकि फील्ड में रहकर खबरों के बीच होना एक अलग रोमांच था—इंडिया टुडे, जागरण, बीबीसी, अमर उजाला, प्रभात खबर—ये सब अनुभव अविस्मरणीय हैं। लेकिन अब मैं समझता हूँ कि सूचना आयुक्त की भूमिका में भी सवालों का जवाब देना और न्याय करना एक तरह की पत्रकारिता ही है। मैं मिस नहीं करता, बल्कि महसूस करता हूँ कि सफर जारी है, बस रूप बदल गया है।


आम आदमी और सूचना 

एक आम नागरिक के लिए सूचना का अधिकार इतना ज़रूरी क्यों है—आप इसे बहुत साधारण शब्दों में कैसे समझाएंगे?

सरल शब्दों में—सूचना का अधिकार मतलब आपका हक है जानने का कि आपका पैसा कहाँ जा रहा है, सरकार क्या कर रही है, आपके अधिकार क्यों नहीं मिल रहे। जैसे घर में बिजली का बिल आने पर आप पूछते हैं कि इतना क्यों लगा, वैसे ही आरटीआई से आप सवाल पूछ सकते हैं। यह अधिकार आपको कमजोर से मजबूत बनाता है—आप सवाल कर सकते हैं।


डर और झिझक का सवाल 

बहुत से लोग आरटीआई लगाने से डरते हैं या झिझकते हैं। आप उन्हें क्या कहना चाहेंगे?

डरिए मत, आरटीआई आपका संवैधानिक हक है। अगर कोई अधिकारी जानकारी नहीं देता है, तो अपील करें—आयोग आपके साथ है। शुरू में झिझक लगती है, लेकिन पहला आरटीआई लगाने के बाद आत्मविश्वास आता है। याद रखें, सूचना माँगना गलत नहीं, छिपाना गलत है। हिम्मत करें, क्योंकि लाखों लोगों ने आरटीआई से न्याय पाया है।
 


युवा लेखक और पत्रकार 

आज के चतुर्वेदी उपनाम वाले या बिना उपनाम वाले—सभी युवा लेखकों और पत्रकारों के लिए आपका क्या संदेश है?

सच्चाई पर अडिग रहो, जल्दबाजी में खबर मत फेंको। पढ़ो, गहराई से समझो, और नैतिकता कभी मत छोड़ो। आज डिजिटल दौर है, लेकिन अच्छी पत्रकारिता वही है जो समाज को दिशा दे। मेरी सलाह—धैर्य रखो, मेहनत करो, और याद रखो कि पत्रकारिता सेवा है, सिर्फ नौकरी नहीं। तुममें गुण हैं, बस जुनून बनाए रखो।


तेज़ दौर, धीमा विवेक 

सोशल मीडिया और त्वरित प्रतिक्रियाओं के इस समय में, आप युवाओं को धैर्य और विवेक को कैसे बचाए रखने की सलाह देंगे?

सोशल मीडिया तेज़ है, लेकिन सच्चाई धीरे-धीरे सामने आती है। पहले सत्यापित करो, फिर शेयर करो। विवेक बचाने के लिए रोज़ खुद से सवाल करो—क्या यह जानकारी सही है? क्या इससे किसी को ठेस पहुँचेगी? धैर्य रखो, क्योंकि जल्दबाजी में फैलाया झूठ समाज को नुकसान पहुँचाता है। विवेक धीमा नहीं, मजबूत होता है—इसे समय दो।


Palagan.com के पाठकों  के लिए संदेश 

Palagan.com जैसे सामाजिक मंचों पर सक्रिय पाठकों और गृहिणियों, युवाओं, वरिष्ठ नागरिकों को आप क्या कहना चाहेंगे?

Palagan जैसे मंच बहुत मूल्यवान हैं, जहाँ विचारों का आदान-प्रदान होता है। गृहिणियों, युवाओं और वरिष्ठों से कहूँगा—अपने अधिकार जानो. पढ़ो, लिखो, सवाल पूछो। समाज बदलता है जब आम लोग जागरूक होते हैं। आपकी आवाज महत्वपूर्ण है—इसे दबने मत दो।


व्यक्तिगत संतोष 

इस नए दायित्व के अंत में आप क्या चाहेंगे कि लोग आपके काम को किस एक बात के लिए याद रखें?

मैं चाहता हूँ कि लोग मुझे याद रखें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने सूचना के अधिकार को और मजबूत किया, पारदर्शिता बढ़ाई, और आम नागरिक को सशक्त बनाया। अगर मेरे फैसलों से एक भी व्यक्ति को न्याय मिला, तो यही मेरी सबसे बड़ी संतुष्टि होगी। अंत भला तो सब भला—यही मेरा विश्वास है।