श्राद्ध

श्राद्ध 

डाॅ सहदेव कृष्ण चतुर्वेदी 
साहित्यचार्य, एम ए, पी एच डी 


श्रद्धान्नं वायुरूपेण नानत्वेप्यनुगच्छति।
पानं भवति यक्षत्वे राक्षसत्वे तथामिशम्।।

श्राद्ध में पितरों को जो कुछ भी अर्पण किया जाता है वह चाहे कुआं ,तालाब आदि के रूप में हो अथवा नकद दक्षिणा  के स्वरूप में उसके प्रतिफल के रूप में परमात्मा हम सभी को स्वर्ग लोक में तथा देव योनियों में यथावत पोषण करते हैं ।श्राद्ध के समय श्रद्धा पूर्वक जो भी वस्तुएं प्रदान की जाती हैं वे सब वस्तुएं अन्य लोक में पितरों के लिए अनंत काल तक अक्षय तृप्ति प्रदान करती हैं पितृ लोक में गया हुआ प्राणी श्राद्ध में दिए गए अन्न को स्वधा रूप में परिणित हुए को ग्रहण करता है।  यदि शुभ कर्मों के प्रभाव से मृत्यु पश्चात देवता बन गया है तो श्राद्ध में दिए हुए अन्न को अमृत के रूप में प्राप्त करता है।  गंधर्व योनि में वह नाना भोगों के रूप में प्राप्त करता है।  पशु योनि में तृण रूप में, नाग योनि में वायु रूप में,  यक्ष योनि में प्रेम रूप में तथा राक्षस योनि में जाने पर रुधिर रूप में प्राप्त करता है। वही मनुष्य योनि प्राप्त करने पर अनेक अन्य रस आदि के रूप में प्राप्त होते हैं।

सेवा करने को अथवा दया भाव को श्राद्ध  की श्रेणी में नहीं माना गया है सेवा शब्द का अर्थ सुश्रुषा, परिचर्या अभ्यर्चा, पूजा आदि होते हैं सामान्य भाषा में इसे आव - भगत, टहल, खिदमत आदि भी कहते हैं परंतु श्राद्ध शब्द का अपर पर्याय वेदों में भी केवल एक मात्र पितृ यज्ञ ही है।  क्योंकि श्राद्ध एक पारिभाषिक शब्द है जो वेद आदि शास्त्रों में और्ध्व दैहिक क्रियाकलापों के एक  समिष्ट नाम के रूप में दिया गया है इसीलिए इसे सभी जगह इसी नाम से अंकित किया गया है


"श्राद्धं वा पितृयज्ञः स्यात्" अर्थात पितृ यज्ञ को श्राद्ध  कहा गया है जिसमें पितरों के उद्देश्य से ब्राह्मणों को अन्नादि प्रदान किया जाए वह श्राद्ध कहलाता है। 
 

अमावस्या एवं पितृ

श्राद्ध तिथि के समय घर में किसी की मृत्यु होने पर अथवा बालक का जन्म होने के कारण जब श्राद्ध संपन्न नहीं हो पाता हो तो शास्त्र का मत है कि शुद्धि के बाद अमावस्या के दिन श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्र का मत पूरा वैज्ञानिक है। कारण यह है कि जैसे हमारी पृथ्वी पर सूर्य चंद्र आदि की गति के तारतम्य से ध्रुव प्रदेश में तथा ग्रीनलैंड आदि भूभागों में 6-6 मास तक सूर्य एवं चंद्र अदृश्य रहते हैं, यूरोप के प्रदेशों में दिन और रात्रिमान 19 तथा 41 घटी तक न्यूनाधिक हो जाते हैं तथा पूर्व पश्चिम भूमध्य रेखा पर न्यूनाधिक होते ही नहीं किंतु पूरे 30 घटी अर्थात 12-12 घंटे के ही सदैव रहते हैं। इसी प्रकार मृत्यु लोक के अतिरिक्त अन्य लोकों में सूर्य चंद्र आदि की गति विगति के तारतम्य  से दिन और रात का मान  विभिन्न प्रकार का होना स्वाभाविक है, पृथ्वी के अत्यंत निकटवर्ती चंद्रमा की कक्षा में स्थित पितृ लोक में हमारे एक मास में पितरों की एक अहोरात्र अर्थात दिन-रात होता है। प्रत्येक मास में कृष्ण अष्टमी से शुक्ल अष्टमी तक पितरों का दिन होता है तथा शुक्ल अष्टमी से कृष्ण अष्टमी तक पितरों की रात होती है। इस प्रकार अमावस्या तिथि पितृ गणों का ठीक मध्यान्ह काल  होता है तथा शास्त्र अनुसार भोजन का यही समय प्रशस्त माना गया है। पितृगण दर्श= अमावस्या के दिन सूर्य को ठीक अपने मस्तक के समान सूत्र में ऊपर देखते हैं। सूर्य चंद्र दोनों अमा= साथ-साथ जब बसते हो उसे स्थिति को अमावस्या कहते हैं तब शंका उत्पन्न होती है कि  अमावस्या को ही पितरों का भोजन समय होता है तो फिर आश्विन मास में श्राद्ध पक्ष सभी तिथियां में पूरे पक्ष भर क्यों मनाते हैं? शास्त्राज्ञा है कि श्राद्ध के पांच भेदों में अन्यतम पार्वण श्राद्ध भी है, तो अमावस्या का श्राद्ध तो पितरों के दैनिक भोजन के समान है परंतु आश्विन मास का पितृपक्ष हमारे विशिष्ट सामाजिक उत्सवों की भांति पितृ गणों का सामूहिक महापर्व है। इसलिए उक्त समय में किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाता है। जिस प्रकार हम नित्य प्रति तो साधारण मध्यान्ह काल  में 11-12 बजे भोजन करते हैं, किंतु त्योहारों में या विवाह आदि महोत्सवों में प्रातः सायं और रात्रि में भी भोजन करते हैं, जन्माष्टमी आदि विशिष्ट त्योहार पर आधी रात में भी व्रत पारणा होता है, ठीक इसी प्रकार आश्विनकालीन पितृपक्ष को पितरों का सामूहिक उत्सव जानना चाहिए। इस समय सभी पितृ अपने पृथ्वी लोकस्थ सगे संबंधियों के यहां अनिमंत्रित भी पहुंचते हैं और उनके द्वारा प्रदान किए गए कव्य से परित्रप्त होकर उन्हें अपने शुभ आशीर्वादों  से आप्लावित करते हैं। जो कृतघ्न जीव मृत आत्माओं के  गाढ़े  खून पसीने से अर्जित संपत्ति का उपभोग तो करते हैं किंतु पितरों के निमित्त कुछ नहीं करते वे पितरों द्वारा शापित होकर अनेक दुखों का कारण बनते हैं।

ज्योतिष गणना के अनुसार मेष राशि के 10 अंश पर वर्तमान सूर्य परमोच्च का होता है और तुला के 10 अंश पर स्थिर होता हुआ परम नीच का होता है अर्थात मेष का सूर्य पृथ्वी कक्षा से सर्वथा दूर होता है और तुला का सूर्य पृथ्वी कक्षा के सर्वथा समीप। पृथ्वी लोक पर किए गए यज्ञादि सभी अनुष्ठान पहले सूर्य मंडल में पहुंचते हैं और फिर वहां से तत्तत् स्थानों पर जाते हैं। देवताओं के निमित्त भौतिक अग्नि में या ब्राह्मणों की जठराग्नि में विधिवत डाला गया हव्य सूर्य द्वारा द्युलोकस्थ देवताओं की तृप्ति का कारण बनता है क्योंकि देवलोक सूर्य कक्षा में ही विद्यमान है। हुत कव्य पहले सूर्य में पहुंचता है और फिर सूर्य मंडल से चंद्र मंडल में जाता है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि चंद्रमा स्वयं प्रकाशमान नहीं है किंतु सूर्य की ही सुषम्णा नामक रश्मि चंद्र मंडल को प्रकाशित करती है। जैसे अमावस्या को उक्त दोनों मंडलों में सानिध्य के कारण पितरों को हमारी वस्तु तुरंत प्राप्त होती है इसी प्रकार कन्या राशि के सूर्य के 10 अंश से तुला राशि के अंश पर्यंत सूर्य के परम नीच कक्षा से में विद्यमान होने के कारण अर्थात पृथ्वी, चंद्र मंडल और सूर्य मंडल के सान्निध्य के कारण कन्यागत श्राद्ध करना भी विज्ञान सम्मत है। कहा गया है - "सूर्ये कन्यागते कुर्यात् श्राद्धं तो न ग्रहाश्रयी"  अर्थात् शरद ऋतु में छठी संक्रांति यानी कन्या के सूर्य में जो अभीप्सित् वस्तुएं पितरों को प्रदान की जाती हैं वे सब स्वर्ग को देने वाली होती है। कन्या के सूर्य में जो बचे हुए 16 दिन हैं वे यज्ञों के तुल्य हैं उनमें पितरों को जो दिया जाता है वह अक्षय होता है। जब तक कन्या से तुला तक क्रमशः सूर्य रहता है तब तक वृश्चिक संक्रांति तक समस्त पितृ लोक खाली रहता है। अतः गृहस्थगण जो कन्यागत सूर्य में पितृ पक्ष में श्राद्ध  नहीं करते पर पाप के भागी होते हैं।

तीन पीढ़ी के ही श्राद्ध क्यों 

वेद आदि शास्त्रों में वसु, रुद्र एवं आदित्य तीन देवताओं को क्रमशः पितृ, पितामह एवं प्रपितामह का पोषक प्रतिनिधि माना गया है। उक्त तीनों में ही विश्वेदेवा अंतर्भूत हैं। अतः पितृ पोषक देवताओं के कारण तीन पीढ़ी के श्राद्ध उचित है। विवाह में भी गोत्रोच्चारण में पितृ, पितामह एवं प्रपितामह इन तीनों का ही ग्रहण होता है। मनुस्मृति में भी कहा गया है 


त्रयाणामुदकं  कार्यं पिंडः प्रवृतते
चतुर्थः संप्रदातैषां  पंचामो नापि विद्यते 

अर्थात पितृ पितामह प्रपितामह को हम श्राद्ध से तृप्त करते हैं। चौथ श्राद्धकर्ता यजमान है, यहां पांचवा कोई अन्य नहीं।

इस प्रकार श्रद्धा शास्त्र सम्मत कृत्य के साथ वैज्ञानिकता से भी परिपूर्ण है।

Dr Sahdev Krishna Chaturvedi