श्रद्धेय स्वर्गीय श्री रमनिधि जी चतुर्वेदी पुत्र स्व. श्री दयाराम जी चतुर्वेदी माता बसुनधरा फिरोजाबाद वासी पता मकान नंबर 111 चौबान मुहल्ला चौकी गेट.
जन्म 1908 मृत्यु 1994 मूल् निवास पर ही हुआ. प्रारंभिक शिक्षा वहीँ पर हुई.
घर में ज्यादा लोग नहीं थे. दो बहन और एक भाई ही थे. सोलह साल की आयु में ही पिता का साया उठ गया था. पूर्वजों ने बिहार तथा नेपाल में काफी जमीनें हासिल कर रखीं थीं.
अंग्रेजी राज्य था. जो भारतीय लोगों को बहुत परेशान करते थे. यातायात के साधन बहुत सीमित और अजीब तरह के थे.
इतनी दूर जाना किस कारण चयन किया अज्ञात है. अनुमान है कि मुगलों का डर वजह रही होगी. जहां ठहरे वहां भारत का अंत और नेपाल की सीमां शुरू होती थी. इलाक़ा सूना शांत था. वहीँ डेरा डाल लिया. जीवनयापन करने लगे.
नए लोगों से पहचान होती गई. दरी और वैद्य का भी काम करते थे. बढ़बाबा हकीम भी थे.
वहां अपनी वैद्यकीय से काफी ख्याती प्राप्त की. एकबार वहां का राजकुमार शिकार पर काठमांडू से हाथियों के काफिले के साथ नीचे आया. शिकार करते करते वह हाथी से गिर पाड़ा. ज़ख्मी होगया. हडीडी टूट गई. उस जमाने में कोई डॉक्टर वगैरे नहीन थे. राजा के काफिले के तलाश करने पर पाया कि भारत की सीमा वाले नवाबगंज नमक गाँव में एक वैद्य रहता है जो कि बहुत जानकर है.
सिपाही लोग बुलाने आए. पूरा हाल सुनाया. ये देखने गए इलाज किया. एक महीना वहां रहकर इलाज कर दिया. राजकुमार काठमांडू चाला गया सेना के साथ.
वापस कुछ दिनों बाद कुछ लोग गाँव आए और कुछ काग़ज़ देकर बोले कि राजा ने आपको खुश होकर नेपाल सीमा वाले गाँव में सौ बीघा जमीन( पौने दो सौ एकर) दी है और उस इलाके की ज़मींदारी भी दी है.
अब राजा के हुकुम से आप यहां के ज़मींदार कर पुकारे जाएंगे.
काफी रुतबा आगया .भारत नेपाल दोनों देशों में काम चलने लगा. दोनों जगह पहुंच बढ़ती गई.
बिहार में भी फौरबीस सहाब नामक एक अँग्रेजी ज़मींदार ने प्रभावित होकर दो तीन गाँवों की जमींदारी देदी . फिर आमदनी इतनी हो गई कि बढ़ते ही चले गए.
बहुत जमीनें अर्जन की करीब भारत नेपाल मिलाकर सोलह सौ एकर के आस पास .एक साम्राज्य सा बन गया.
1858 के गदर के बाद घर के दरवाजे पर गोलियों की चोट हुई. घर पर कोई नही था. फिर घर की चिंता सताने लगी. और फिर यहां भी ध्यान देना शुरू कर दिया.
राज नीति में नहिं थे पर, देश से प्यार था और, अंग्रेजों से उनके भारतीयों के प्रति कटु रवैये से नफरत हो गई थी.
उसी दरमियान बढ़ती उम्र के साथ कुछ नयी उम्र के लड़कों के साथ अंग्रेजो के खिलाफ एक ग्रुप बना लिया और तरह तरह की प्लानिंग करने लगे.
उनमें से एक प्रमुख जिनका कि नाम श्री हरिशंकर शर्मा जी था. वो यह खबर लेकर आए कि फिरोजाबाद में रह रहे भारतीयों के खिलाफ एक अंग्रेज ऑफिसर कोई विशेष कार्यक्रम चलाने हेतु आ रहा है.
बस फिर क्या था. दोनों ने मिल कर प्लान बनाना चालू कर दिया. बॉम्ब बनाने का नुस्खा किसी तरह से प्राप्त कर लिया. और जिस दिन जिस जगह जिस समय वो उधर आने वाला था उसके थोड़े समय पहले से एक बड़े कांच का बोतल बॉम्ब तैयार कर के एक झोले में रख कर दोनों साथ चौकी गेट वाले अपने मकान से निकल पड़े. ऑफिसर को देखने काफी भीड़ इकट्ठी हो रही थी. इतने में ही अंग्रेज का आने का समय हो गया.
इन लोगों ने पोजीशन संभालनी शुरू कर दी. झोला रामनिधि चौबे के हाथ से शर्मा जी ने लेकर ऑफिसर पर बचते हुए बॉम्ब फेंकते हुए बोला, भागो . बॉम्ब फुट गया. शर्मा जी के चिथड़े उड़ गए. रमा निधि जी भी घायल होकर गिर पड़े. अफरा-तफरी मच गई. अँग्रेजी सरकार के सिपाहियों द्वारा पकड़ लिए गए. ऑफिसर भी बच गया. निशाना सही नहिं लगा था.
सीधे पकड़ कर आगरा जैल ले गए. बहुत अत्याचार किया इनके साथ. फांसी देना चाहते थे.
घर में पैरवी के लिए कोई नहिं था. इटावा में उनकी पत्नी के भाई को खबर पहुंचीं.
इतने में ही अंग्रेज जेलर का तबादला हो गया. दूसरा जो आया थोड़ा रहम दिल था.
उसने घर की तलाशी का आदेश दिया. पर घर मे कुछ नही मिला. घर में किसी को पाया भी नहीँ कम उम्र की बहू एक बूढ़ी सास और एक हाथ में लकवा लगा उनके भायी को ही पाया.
सबूतों के अभाव में अंततः रामनिधि जी को बरी किया गया

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