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रँगी मैं तौ रँगन तिहारे, और रंग जिनि डारौ।।
काऊ बात सों होऊँ जौ बाहरि, तो तुम गारी उचारौ।।
काहे कों बरबस लोग हँसावत, निलज खेल निरवारौ।।
‘हरीचन्द’ गर लगि के मेरे, जिय की होंस निकारौ।।
