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सखी मेरे नैननि में, मनमोहन लागि रह्यौ।।
कल न परति बिन देखें एक छिन, बिरह ने गात दह्यौ।।
जब सें दृष्टि पड़े नँदनँदन, तन मन चैन गयौ।।
‘जानकीदास’ रूप रस माते, जग उपहास भयौ।।