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उड़त गुलाल लाल भए बादर,
बीच कुमकुमा की मूँठि, घननि जैसे दामिन दमकै री।।
खेलत हैं दामिनि घन सुन्दर,
कृष्ण रसिक संग री।
‘दया सखी’ फागुन के दिननि में,
सावन सरसै री।।