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होरी आजु जरै चाँहि कालि जरै, मेरौ कुँवर कन्हाई मोहि आनि मिले।
जब सें छाँड़ि गये मन-मोहन, चित नहिं धीर धरै।
दिन नहिं चैन रित नहिं निंदिया, रोवति राधे दोऊ करन मलै।।
बन बन व्याकुल फिरति राधिका, मन में सोच करै।
‘हरि बिलास’ हरि ढीठ लँगरवा, बिना श्याम मेरें कौन खिलै।।