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यशुमति करति दधि मंथान अंक में,
निजलाल करावत पय पान।।
सुनु तजि उठि गई यशोदा क्षीर उफनत आनि,
माट इत हरि भंग कीन्हों, लगे माखन खान।।
नन्द नारि सकोप धाईं, लख्यो कौतुक कान्ह,
दाम ऊखल उदर बांध्यो, मानि गोरस हानि।।
जासु डर तिहुं लोक कांपत, सुरासुर बलवान,
”हरिविलास“ दयाल सोईं, भक्त वश भगवान।।