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कालि कहाँ हे कन्हाई, हमें राति नींद न आई।।
तुम्हरी तौ रैन चैन सों गुजरी, कुबजा सों प्रीति लगाई।
हम तड़पैं जैंसे जल बिन मछरी, मुरकी नरम कलाई,
करत हमसों चतुराई।।
प्रातहिं उठि मुख मंजन करिकें, मुतियन माँग भराई।
हम तौ आजु स्याम सँग सोवें, फुलवनि सेज बिछाई,
कहत अब बात बनाई।।
आजु भले आये मनमोहन, उनसों आँखि चुराई।
ऐसी प्रीति न अब निबहैगी, जानि लेहु जदुराई,
तुम्हें है नन्द दुहाई।।