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अबीर मलौंगी कपोल तिहारे, जसुदा लाल ब्रजराज दुलारे।।
यह रितु फागुन छाय रही है, छैल छबीले हौ प्रान पियारे।।
रैन जगाय लेहु रंग रसिया, जो पिय आये हौ द्वार हमारे।।
‘ख्यालखुसाल’ भरे मन मोहन, जोबन उमँगि उमँगि उमँगा रे।।
